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एक जैसे नाम पर पुलिस ने 68 साल के बुजुर्ग निर्दोष को भेजा जेल

एक जैसे नाम पर पुलिस ने 68 साल के बुजुर्ग निर्दोष को भेजा जेल

अख़बार जगत। पुलिस प्रशासन की गंभीरता से जांच ना करना और लापरवाही के कारण  एक 68 साल के एक आदिवासी बुजुर्ग को  पुलिस  चार महीने जेल में गुजारने पड़े। पेरोल का उल्लंघन कर भागे हत्यारे की बजाय पुलिस ने एक जैसे नाम वाले इस बुजुर्ग को पकड़कर जेल में डाल दिया। बुजुर्ग के बेटे ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। कोर्ट के आदेश पर प्रमुख सचिव ने जांच करवाई तो पता चला कि पुलिस ने गलत व्यक्ति को जेल में डाल रखा है। कोर्ट ने शासन पर 5 लाख रुपए हर्जाना लगाया। इस मामले में कोर्ट में गलत शपथ पत्र देने वाले एसडीओ के खिलाफ अवमानना का केस दर्ज कराने का आदेश भी दिया। ग्राम देवधा जिला धार निवासी हुसान पिता रामसिंह (68) को पुलिस ने 18 अक्टूबर 2019 को गिरफ्तार किया था।

उस पर आरोप था कि उसने हत्या की थी और सेशन कोर्ट ने उसे प्रकरण क्रमांक 41/76 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उसे पेरोल पर छोड़ा गया था लेकिन इसके बाद वह वापस ही नहीं आया। पुलिस ने हुसान को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया। हुसान पुलिस के सामने गुहार लगाता रहा कि उसने कभी कोई हत्या नहीं की, न ही उसे कभी कोर्ट ने सजा सुनाई है, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी। हुसान के बेटे कमलेश ने हाई कोर्ट में इस संबंध में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। इसमें कहा कि कोर्ट ने प्रकरण क्रमांक 41/76 में जिस व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी उसका नाम हुस्ना पिता रामसिंह था। वह व्यक्ति पेरोल पर छूटा जरूर था लेकिन उसकी 10 सितंबर 2016 को ही मौत हो चुकी है। पुलिस ने स्थायी वारंट तामील कराने के चक्कर में गलत व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल भेजा है।

इधर शासन की तरफ से कोर्ट में एसडीओ ने शपथ पत्र दिया। इसमें कार्रवाई को सही बताते हुए कहा कि उसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, जिसे सेशन कोर्ट ने हत्या के आरोप में सजा सुनाई है। इस पर हाई कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह) को आदेश दिया कि वे इस मामले में जांच कर कोर्ट को बताएं कि हत्या की सजा पाने वाला हुस्ना पिता रामसिंह और जेल भेजा गया हुसना पिता रामसिंह एक ही व्यक्ति हैं या अलग-अलग। प्रमुख सचिव ने जांच कर रिपोर्ट पेश की तो पता चला कि दोनों ही व्यक्ति अलग-अलग हैं।

पुलिस ने लापरवाहीपूर्वक गलत व्यक्ति को चार महीने से जेल में बंद कर रखा है। कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकारते हुए कहा कि पुलिस की लापरवाही से आदिवासी बुजुर्ग को चार माह जेल में बिताने पड़े। जो समय बुजुर्ग ने जेल में गुजारा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। फिर भी शासन हर्जाने के बतौर तीस दिन के भीतर उन्हें पांच लाख रुपए अदा करे।

शासन की तरफ से तर्क रखा गया था कि यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत नहीं आता है। कोर्ट ने इससे खारिज करते हुए कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण को लेकर इससे अच्छा केस नहीं हो सकता। कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह) की तारीफ करते हुए कहा है कि तत्परता से उन्होंने न्यूनतम समय में जांच कर सच्चाई कोर्ट के सामने रखी है। कोर्ट ने याचिका में गलत शपथ पत्र प्रस्तुत करने वाले एसडीओ के खिलाफ अवमानना का प्रकरण दर्ज करने के आदेश भी दिए। उन सभी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी, जिन्होंने रोजनामचे में गलत विवरण भरे थे।

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    Web Title : Police sent 68-year-old elderly innocent to jail in the same name